अफसरों की दहशतगर्दी- किस प्रकार की आज़ादी?

कल मैं दादर स्टेशन के पास टहल रहा था। वहां सड़को के किनारे गरीब लोग अपना खाने पीने का ठेला लगा के धंधा करते है। मुंबई जैसे शहर में इन ठेले वालो की बहुत अहमियत है। अगर यह लोग न हो तो आम आदमी इस शहर में अपना भोजन ही न कर पाए। मानता हूँ इनके होने से सड़क और फुटपाथ थोड़ी सकदी हो जाती है लेकिन इस शहर में अमीर से अमीर आदमी ज़मीन न तो खरीद सकता है ना ही उसका किराया दे सकता है। और फिर भारत की सड़को पे ठेले होना और इस प्रकार सामान की बिक्री होना अब इस देश की संस्कृति का हिस्सा बन गया है। में ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं कह रहा क्यूंकि मुझे ठेले वालो के साथ हमदर्दी है बल्कि भारत के इतिहास में जब भी शहरी बाज़ारो का वर्णन किया गया है उन्हें कुछ ऐसे ही रूप में दर्शाया गया है।
तो कल जब मैं दादर स्टेशन के पास लगे खाने के व्यंजन के ठेले पे खड़ा अपने आर्डर का वेट कर रहा था तभी एक मध्य वर्गी आदमी धुप का चश्मा लगाए हुए आया और बड़ी ज़ोर से ठेले पे पड़ी सब्ज़ियों को ठोकर देके चीखने लगा। उसने ठेले वाले को बड़ी बदतमीज़ी से धमकी दी और उसे दो मिनट का समय दिया अपना सामान हटाने के लिए। यह बोल के वह आगे चलता बना और अगले ठेले वाले को भी इसी बर्ताव के साथ वहा से हटने को बोला। कुछ ही मिनटों में पूरी सड़क पे एक हड़कंप मच गयी और ठेले वाले इधर उधर अपना सामान संभाल के भागते नज़र आ रहे थे। जब मैंने अपने खाने के ठेले वाले से पुछा तो उसने मुझे बताया की वह BMC (बृहन मुंबई महानगर पालिका) का अफसर है और वह इस जगह को सभी ठेले वालो से मुक्त करवाने आया है। मैंने उस अफसर का कुछ देर पीछा किया वह हर ठेले वाले के सामान को उठा के सड़क पे फेक रहा था या कही बेचने वाले को कालर से पकड़ कर धक्का दे रहा था मानो उसके ताकत की कोई सीमा ही ना हो। ऐसे मारते हुए उसकी शकल पे भय का कोई निशान नहीं था और दूसरी तरफ गरीब ठेले वालो के मानो डर से होशोआवाज़ ही उड़ गए थे।
मैंने अक्सर पढ़ा था की BMC ठेले वालो के साथ ऐसा बर्ताव करती है और सिर्फ BMC ही नहीं बल्कि देश की लगभग सभी नगर पालिका अपने शहरों में ठेले वालो को ऐसे ही हटाती है। थोड़ा और पढ़ने के बाद मुझे यह ज्ञात हुआ की BMC में ठेले वालो को public nuisance (जनता के लिए बाधा) बताया जाता है। यह जान के बड़ा अटपटा सा लगा, की एक तरफ सभी जनता इन लोगो के व्यंजनों और इनके सस्ते सामान को पूरा लुफ्त उठाती है और दूसरी तरफ इन्हे बाधा भी बोलती है। बादमे मालूम हुआ की यह कानून सभी नगर पालिका के कानूनों में अंग्रेज़ो के समय से है। वह इन ठेले वालो को गन्दगी मानते थे और उनके विचार में यह उनकी सुन्दर योजनाबद्ध शहरों की सडको और बाज़ारो को उथल पुथल और गन्दा कर देते थे। इसके सिवाय इन लोगो को कागज़ी नियमो के काबू में रखना बड़ा कठिन होता है। तो इनको कानूनी रूप से गैर बताके हटाना ही वो ठीक समझते थे। किसी भी गरीब की रोज़ी रोटी को सिर्फ कानून का उलंगन बोलके रोकना मुश्किल होता है और अंग्रेज़ अपनी पुलिस ताकत का जम के स्तमाल करते थे। लोगो पे डंडे बरसाने से लेके उनके ठेलो को पलटा देना या उनके सामान को उथल पुथल कर ख़राब कर देना एक आम तरकीब थी।
इसी भेदभाव को देख के तो देश में गांधीजी और अन्य जागरूक लोग बोले की जो संस्था या सरकार अपने शासन में आने वाले लोगो के साथ इस प्रकार बर्ताव करे वह कभी लोगो की हो ही नहीं सकती। ऐसी सरकार और ऐसा राज गैर है और इस से आज़ादी की लड़ाई हमे लड़नी होगी। देश को उन्होंने अंग्रेज़ के शासन से आज़ाद तो कर दिया लेकिन उनकी बनायीं हुई BMC और उनके तौर तरीको और कानून से हम खुदको आज़ाद नहीं कर पाए है। आज भी इसी देश का अफसर जब सड़को पे चलता है तो सुरक्षा की बजाये दहशत महसूस होती है। देश तो अब आज़ाद है लेकिन इस आज़ाद देश में हम अपने ही लोगो के साथ कितने भेदभाव से बर्ताव कर रहे है मानो कोई विदेशी लोग हमपे शासन कर रहे हो।

यह घटना दादर स्टेशन के करीब, १४ मई शाम पांच बजे घटि और इस लेख का लेखक वहा पे मौजूद स्वयं घटनाओ को देख रहा था।

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