एक बार गांधीजी ने काका केलकर को चार पांच नीम के पत्ते तोड़ने को कहा। हमारी तरह काका केलकर भी एक पूरी डाली तोड़ ले आये, गांधीजी यह देख के बहुत दुखी हुए। उन्होंने कहा जब तुम्हे चार पत्ती चाहिए तो तुम पूरी डाली क्यों तोड़ लाये, यह एक प्रकार की हिंसा है।
यह एक छोटा किस्सा है जो ऐसे देखने पे ज़्यादा महत्व नहीं रखता पर यह एक बहुत ज़रूरी बात दर्शाता है हमारे आज के उपभोक्तावादी बर्ताव के बारे में। अगर हमे एक चाहिए होता है तो हम दो मंगवाते है, कपडे पहने को बहुत है पर दिखाने के लिए और खरीदते है। ऐसा लगता है ऐसा करके हमे ख़ुशी मिलेगी। यह बात हम भूल जाते है की ज़रुरत से ज़्यादा लेना एक प्रकार की हिंसा है, प्रकर्ति और आने वाली पीढ़ियों के ऊपर । पर उन सब से ज़्यादा यह हमपे खुदपे एक हिंसा है। कोई कितना भी कहे अगर आप एक बार हिंसा छोटी हिंसा जानते हुऐ भी रोज़ करेंगे तोह सिस्टमिक हिंसा को कभी रोक नहीं पाएंगे बल्कि उसका हिस्सा बनते चले जायेंगे। जिस तरह अमीर आदमी जानता है उसे और कपड़ो की ज़रुरत नहीं है और यह भी जानता है की प्रकर्ति इस लालची खरीद से नष्ट हो रही है। कुछ तो यह भी जानते है की यह कपडे बहुत क़ामग़र को शोषित करके बनता है लेकिन यह सब जानते हुए भी वह एक और खरीदता है। क्यों?
क्यूंकि वो सिस्टमिक वायलेंस का अब एक हिस्सा बन गया है जिसमे उसने ख़ुद छोटी छोटी हिंसा करि है और अब उसकी अंतर आवाज़ को जान कर भी हिंसा करने से फरक नहीं पड़ता। जिस तरह एक जूठ को छिपाने के लिए सो और जूठ बोलने पड़ते है उसी तरह एक हिंसा को छिपाने के लिए सो और हिंसा करनी पड़ती है।
इस हिंसा और जूठ से बहार आने का एक रास्ता है: पहला तो इस बात को पूर्ण रूप से स्वीकारना की हमसे हिंसा हुई फिर उससे पूर्ण रूप से छोड़ने की तरफ प्रक्रिया करना। धीरे धीरे अपने जीवन से छोटी छोटी हिंसा को कम करना। यही तरीका है सिस्टमिक हिंसा और असत्य को रोकने का।
यह लिखते वक़्त में जानता हु की में अपनी कथनी और करनी में एक बहुत बड़ा फरक ला रहा हु, पर में कोशिश कर रहा हु बदलने की और चाहूंगा की इस कोशिश में और लोग भी साथ दे मेरा ताकि कोई इस संघर्ष में अकेला न रहे।
जैसा की गांधीजी ने कहा था की ‘प्रकर्ति के पास हर आदमी की ज़रूरतों के लिए बहुत है लेकिन एक आदमी के भी लालच के लिए नहीं है।’
